बाड़मेर की धरती पर वर्षा कभी-कभार आने वाली मेहमान है। पर यहाँ के जीवन में वह हर जगह मौजूद है — खेत में, तालाब पर, रसोई में, रिश्तों में, और गीतों में। यहाँ प्रस्तुत छह लोकगीत मारवाड़ी में हैं और सबके केंद्र में वर्षा है। ये गीत महिलाएँ समूह में गाती हैं — कभी वर्षा न होने पर उसे न्योता देने के लिए, कभी वर्षा होने पर उसका आनंद मनाने के लिए।

इन गीतों को एक साथ पढ़ने पर मरुभूमि और वर्षा का पूरा रिश्ता सामने आता है। एक गीत में वर्षा से विनती है — तेरे बिना पक्षी तड़पते हैं, नाड़ी-नाले नहीं भरते, राजा भी भिखारी हो जाता है। एक गीत में आषाढ़ से आश्विन तक वर्षा के आने के संकेत क्रम से दर्ज हैं — मेंढकों का टर्राना, मोरों की पुकार, उत्तर दिशा में बिजली का चमकना। एक गीत में विवाहिता बादलों से दोनों दिशाओं में बरसने की प्रार्थना करती है — मायके में, जहाँ भाई हल चला रहा है, और ससुराल में, जहाँ पति हल चला रहा है। एक गीत में पत्नी पति से आग्रह करती है कि इस ऋतु में चाकरी पर न जाए — घर रहेगा तो लापसी बनेगी, बाजरे की खीच बनेगी। और वर्षा हो जाने पर गीतों में नाड़ियाँ भरती हैं, तालाब बनवाने वाले बड़ों को याद किया जाता है, और बाजरा, मूंग, ग्वार की फसलें लहलहाती हैं।
इन गीतों में केवल भाव नहीं, ज्ञान भी है। किस महीने में कौन सा संकेत वर्षा की सूचना देता है, धीमी और लगातार वर्षा क्यों अच्छी मानी जाती है, नाड़ी और तालाब कौन बनवाता था और उनका सम्मान कैसे होता था, वर्षा के साथ कौन सी फसल बोई जाती है — पीढ़ियों का यह अनुभव लोकभाषा में बँधकर गीतों में सुरक्षित है। गीतों में आए शब्द — कोठळ, ऊबो, मिमझर, नाड़ी, धोरा, इंडोणी — मरुभूमि के जीवन का शब्दकोश हैं, जो किताबों में नहीं, गाने वालों की स्मृति में रहा है।
हर गीत के पृष्ठ पर उसकी पृष्ठभूमि, रिकॉर्डिंग, मूल मारवाड़ी पाठ और सरल हिंदी अर्थ दिया गया है।
- अरे तुझ रे बिन ओ पंखी पंखरू रे तड़पे — वर्षा के बिना पक्षी, किसान, गाय और मायके की राह देखती बेटी, सबका जीवन ठहर जाता है। महिलाएँ मिलकर वर्षा को घर आने का न्योता देती हैं।
- मेह री कोठळ उमटी कुमटिया भूटा मेस — घने बादल उमड़ते हैं, नाड़ियाँ और तालाब भर जाते हैं। पानी भरने गई एक नवविवाहिता अपने परदेस से लौटे पति को पहचान नहीं पाती।
- काळी काळी कोठळ राज उपड़ी — बादल घिर आए हैं और बूँदें बरसने लगी हैं। पत्नी पति से आग्रह करती है कि इस ऋतु में चाकरी पर न जाए — घर रहेगा तो लापसी बनेगी, बाजरे की खीच बनेगी।
- पिवरिये रे मारग माथे (मारी मिमझर) — रिमझिम वर्षा में नीम हरी हो गई है, खेतों में हल चल रहे हैं और बाजरा, मूंग, ग्वार लहलहाने लगे हैं। हर पंक्ति में “मारी मिमझर” की टेक लौटती है।
- बरसे बरसे रे मेछड़ला — विवाहिता बादलों से दोनों दिशाओं में बरसने की प्रार्थना करती है: पिता के गाँव में, जहाँ भाई हल चला रहा है, और ससुराल में, जहाँ पति हल चला रहा है।
- अरे चंद्रमा सूरज एक रे — आषाढ़ से आश्विन तक वर्षा के संकेतों का गीत: मेंढकों का टर्राना, मोरों की पुकार, उत्तर दिशा में बिजली, पपीहे का बोलना और तालाबों का भरना।
इन गीतों का दस्तावेज़ीकरण टीना गौड़ ने किया। वे अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की छात्रा हैं और 2026 में संभाव के साथ अपनी इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने बाड़मेर में ये गीत सुने, रिकॉर्ड किए, लिखे और उनका अनुवाद किया।
