बरसे बरसे रे मेछड़ला

1–2 minutes

read

यह बाड़मेर का वर्षा और कृषि गीत है। मरुभूमि की खेती पूरी तरह वर्षा पर टिकी है — वर्षा हो तो हल चलते हैं, बाजरा और मूंग बोए जाते हैं, और पूरा परिवार खेती में जुट जाता है। इस गीत की खास बात यह है कि गाने वाली विवाहिता बादलों से केवल अपने गाँव के लिए नहीं माँगती। वह पहले पिता के गाँव की ओर वर्षा माँगती है, जहाँ उसका भाई हल चला रहा है, और फिर ससुराल की ओर, जहाँ उसका पति हल चला रहा है। एक विवाहित स्त्री के जीवन के दोनों घर — मायका और ससुराल — इस गीत में एक ही प्रार्थना में बँधे हैं।

गीत

मोटी ने छोटों रे बिरोसा मेस रे
बरसे बरसे रे मेछड़ला तू बाबोसा रे दिश में

ओठे ने माता रो जायों हळ खड़े
बोएजो बोएजो ओ बीरा बाई रा बाजरियो ए बीज

जोता ने दिराड़ो हरिया मूंगों रा
सांवलियो सांवलियो हंजा मारू काजळिये री रेत

मोटोड़ी छोटों रो बरसे मेह
बरसे बरसे रे मेछड़ला तू सुसरा जी रे दिश में

ओठे ने सासू रो जायों हळ खड़े
बोएजो बोएजो ओ सासू रा जायो बाजरियो ए बीज

जोता ने दिराड़ो हरिया मूंगों रा

सरल अर्थ

बड़ी-बड़ी और छोटी-छोटी बूँदें बरस रही हैं।

हे बादलो! मेरे बाबोसा (पिताजी) की दिशा में खूब बरसो। वहाँ मेरी माता का जाया — मेरा भाई — खेत में हल चला रहा है। हे भाई! बाजरे के बीज बोते जाओ। जोते हुए खेतों में मूंग की फसल हरी-भरी हो जाए, और काजल जैसी सांवली मरुधरा की रेत हरियाली से सुंदर दिखने लगे।

हे बादलो! अब मेरे ससुरजी की दिशा में भी बरसो। वहाँ मेरी सासूजी का जाया — मेरा पति — खेत में हल चला रहा है। हे प्रिय! बाजरे के बीज बोते जाओ। वहाँ भी जोते खेतों में मूंग की फसल हरी-भरी हो जाए।

यह गीत बाड़मेर में दर्ज किया गया। दस्तावेज़ीकरण और अनुवाद: टीना गौड़, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से इंटर्न।

Discover more from Sambhaav Trust

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading