काळी काळी कोठळ राज उपड़ी

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यह बाड़मेर का वर्षा ऋतु का गीत है। पहले के समय में बहुत से पुरुष चाकरी यानी रोजगार के लिए गाँव से दूर रहते थे। वर्षा आते ही खेती का काम शुरू होता था और घर पर सबकी ज़रूरत होती थी। इस गीत में पत्नी वर्षा के आगमन पर अपने पति से आग्रह करती है कि वह परदेस न जाए, यह ऋतु परिवार के साथ घर पर बिताए। बदले में वह जो देने का वादा करती है, वह सब इसी धरती का है — लापसी, बाजरे की खीच, कोमचा, चूड़ियाँ, हरे लाख का श्रृंगार। गीत बताता है कि वर्षा केवल खेतों को नहीं भिगोती — वह भोजन, श्रृंगार, दाम्पत्य और पूरे पारिवारिक जीवन को बदल देती है।

गीत

काळी काळी कॉठळ राज उपड़ी
कोई मोटोडी छोटों रो बरसे मेस
भंवर मत जाइजो राज चाकरी

भंवर मत चढ़जो राज चाकरी
कोई रेवो तो ओढो राज कोमचो
कोई चढ़ो तो ओढू राज चुन्दड़ी

काळी काळी कॉठळ राज उपड़ी
कोई मोटोडी छोटों रो बरसे मेस
भंवर मत चढ़जो राज चाकरी

कोई रेवो तो रोन्धू राज लापसी
कोई चढ़ो बाजरियो खीच
भंवर मत जाइजो राज चाकरी

कोई रेवो तो पैरू राज चुड़ैलों
चढतो ने लीलोड़ी लाख
भंवर मत जाइजो राज चाकरी

सरल अर्थ

हे प्रिय! आकाश में काले-काले बादल छा गए हैं। बड़ी-छोटी बूँदें बरसने लगी हैं। इस ऋतु में चाकरी पर मत जाइए।

घर रहेंगे तो मैं आपको ओढ़ने के लिए कोमचा दूँगी, और स्वयं भी सुंदर चुनरी ओढ़कर आपका साथ निभाऊँगी।

घर रहेंगे तो प्रेम से लापसी बनाऊँगी और बाजरे की स्वादिष्ट खीच खिलाऊँगी।

घर रहेंगे तो सुंदर चूड़ियाँ पहनूँगी और हरे रंग के लाख का श्रृंगार करूँगी।

हे प्रिय! इस सुहावनी वर्षा ऋतु में मुझे छोड़कर नौकरी पर मत जाइए।

यह गीत बाड़मेर में दर्ज किया गया। दस्तावेज़ीकरण और अनुवाद: टीना गौड़, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से इंटर्न।

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