मेह री कोठळ उमटी कुमटिया भूटा मेस

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यह बाड़मेर का वर्षा और पणिहारी गीत है। “कोठळ” यानी घने काले बादल। मरुभूमि में जब अच्छी वर्षा होती है, तो नाड़ियाँ और तालाब भर जाते हैं। ऐसे में महिलाएँ पानी भरने तालाब पर इकट्ठी होती थीं और समूह में यह गीत गाती थीं। गीत में वर्षा के आनंद के साथ जल संरचनाएँ बनवाने वाले बड़ों का सम्मान है — नाड़ियाँ किसने खुदवाईं, तालाब किसने बनवाया, और उनकी पूजा किस चीज़ से हो। इसी के साथ गीत एक नवविवाहिता की कथा कहता है, जिसका पति परदेस से लौटता है, पर वह उसे पहचान नहीं पाती। यह गीत किसी एक घटना का वर्णन नहीं है — लोकजीवन से उठी एक कल्पनात्मक कथा है, जिसमें वर्षा, जलस्रोत, स्त्रियों का दैनिक जीवन और विरह, सब एक साथ बुने हुए हैं।

गीत

मेह री कोठळ उमटी कुमटिया भूटा मेस
आज धराऊ धोरा धुंधळा मोटी छांटो रो मेस

भारीया नाडी नाडिया भरियो भीम तालाब
किण जी खोदाया नाडी नाडिया किण जी खोदायो भीम तालाब
भाभे जी खोदाया नाडी नाडिया सुसरा जी खोदायो भीम तालाब

कवणीये बधाऊं नाडी नाडिया कवणीये बधाऊं भीम तालाब
नारेळ बधाऊं नाडी नाडिया मोतीड़े बधाऊं भीम तालाब

सात सहेलियों रो झूलरो गई रे पोणि रे तालाब
सातों सहेलियों भर बेड़ा ने पासी सोंचरी एकलड़ी हुँ रई रे तालाब

एक अगुणि ओठी आवियो आथूनो झपेट्यो जाय
घड़ियों नी डूबे ओठी बेड़ियों इन्डोणी मोरी तिर तिर जाय

सात सहेलियों रे चूड़ा चुंदड़ी थोरा बिलखा भेष
साथ सहेलियों रा पिया घरे बसे मारो पिया बसे परदेश

सात सहेलियों रे काजळ टिबकी थोरे बिलखा नेण
साथ सहेलियों रा पिया घरे हळिया खड़े मारो पिया बसे परदेश

घड़ो तसीड़ तीखे ताल में रे चढजा मोरोड़े लार
बाळू झाड़ू ओठी थारी जीभड़ी ऑंखों में सांभर वालो लूण

भेतो घड़ाऊ गौड़ी रे भाळलो गळे में घड़ाऊ नवसर हार
भाळलिया ओठी मोरे घरे घणा खुंटीयो में टोंग्या नवसर हार

घरे गयो ने सासु पूछियो कठोडे लगाई बहू इति जेज
एक ओठी सासु आवियो ने पूछी मोरे मनड़े री बात

किण जी सरीखा डिगा पातळा ने किण जी रो आवे उणियार
देवर सरीखा डिगा पातळा ने नंदल बाई रो आवे उनियार

बोई कहिजे थोरो परणियों ने जाओ उणो रे ही लार
पाळ चढू ने नीची उतरूं जोउ ओठी जी थोरी भाट

सूरज री किरणों में ओठी भळकियों आओ तो लेउ मोतीड़े री थाल

सरल अर्थ

घने काले बादल उमड़ आए हैं। रेत के धोरे धुंधले दिख रहे हैं और बड़ी-बड़ी बूँदें गिर रही हैं। वर्षा से नाड़ियाँ और भीम तालाब भर गए हैं। कोई पूछता है — ये नाड़ियाँ किसने खुदवाईं, यह तालाब किसने बनवाया? युवती बताती है — नाड़ियाँ परिवार के बड़ों ने खुदवाईं और तालाब ससुर जी ने बनवाया। वह नाड़ियों की पूजा नारियल से और तालाब का सम्मान मोतियों से करेगी।

सात सहेलियाँ पानी भरने तालाब पर जाती हैं। सब घड़े भरकर लौट जाती हैं, पर वह अकेली किनारे रह जाती है। तभी पूर्व दिशा से एक ऊँट सवार आता है और तेज हवा चलने लगती है — घड़ा तो नहीं डूबता, पर इंडोणी पानी में तैरती चली जाती है।

ऊँट सवार पूछता है — तुम्हारी सहेलियाँ चूड़ा-चुंदड़ी में सजी हैं, तुम्हारा वेश उदास क्यों? तुम्हारी आँखें उदास क्यों? वह कहती है — उनके पति घर पर खेतों में हल चला रहे हैं, मेरा पति परदेस में है।

वह उसे साथ चलने को कहता है, नथ और नौसर हार बनवाने का लालच देता है। युवती क्रोध में जवाब देती है — मैं तुम्हारी जीभ काट दूँगी, आँखों में सांभर झील का नमक भर दूँगी। मेरे घर में नथ और नौसर हार पहले से खूँटी पर टँगे हैं।

घर लौटने पर सास पूछती है — बहू, इतनी देर क्यों हुई? वह बताती है — तालाब पर एक ऊँट सवार आया था। सास पूछती है — कैसा दिखता था? बहू कहती है — देवर जैसा लंबा-पतला, चेहरा ननद जैसा। सास कहती है — अरी, वही तो तुम्हारा पति है, परदेस से लौट आया है।

तब वह बार-बार पाल पर चढ़कर और उतरकर पति की राह देखती है। सूरज की किरणों में जब वह चमकता दिखाई देता है, तो वह मोतियों की थाली लेकर उसके स्वागत के लिए बढ़ जाती है।

यह गीत बाड़मेर में दर्ज किया गया। दस्तावेज़ीकरण और अनुवाद: टीना गौड़, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से इंटर्न।

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