पीढ़ियों की विरासत और बाज़ार का मुनाफा: नारायण जी का बीज आंदोलन

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लेखक: सुधीर सैनी और खुशबू कुमावत

सांसरपुर, डूंगरपुर (राजस्थान)

सांसरपुर गाँव के ‘किसान नेता’ नारायण जी

डूंगरपुर के सांसरपुर गाँव में नारायण जी को लोग ‘किसान नेता’ कहते हैं। बाज़ार में गरीब किसानों का अपमान और शोषण देखकर उन्होंने 1981 में देसी बीज सहेजने शुरू किए। आज उनके पास 400 से ज़्यादा पारंपरिक किस्मों का अपना बीज बैंक है, जहाँ पैसे नहीं चलते — किसान जितना बीज ले जाता है, फसल के बाद उतना ही लौटा देता है। यह कहानी है एक किसान की, जिसने अकेले दम पर बीज को बाज़ार के मुनाफे से निकालकर वापस किसानों के हाथ में सौंप दिया

बाज़ार का कड़वा सच और किसानों का शोषण

राजस्थान के डूंगरपुर जिले में एक इलाका है सांसरपुर। यह एक पिछड़ा हुआ जनजातीय क्षेत्र माना जाता है, जहाँ के ज़्यादातर लोग खेती-किसानी पर ही निर्भर हैं। इसी गाँव में नारायण जी रहते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग सम्मान से ‘किसान नेता’ कहते हैं। नारायण जी का परिवार पीढ़ियों से पारंपरिक तरीके से खेती कर रहा है। उनके दादा और परदादा भी इसी मिट्टी से जुड़े थे।

नारायण जी बताते हैं कि यहाँ के किसान बहुत गरीब हैं। इस वजह से शुरुआत में उन्हें सबसे बड़ी समस्या का सामना बाज़ार में करना पड़ता था। जब भी कोई किसान गाँव के बाज़ार में बीज बेचने वाले दुकानदारों के पास जाता, तो दुकानदार उन किसानों से सीधे मुँह बात भी नहीं करते थे और उन्हें दुकान की सीढ़ी से नीचे उतार देते थे।

नारायण जी ने आवाज़ उठाई 

नारायण जी एक वाक़या याद करते हैं। वे एक दिन बाज़ार में बीज की एक दुकान पर खड़े थे। उन्होंने देखा कि एक गरीब किसान के पास पैसे कम होने के कारण दुकानदार उसे बीज देने से मना कर रहा था। किसान मिन्नतें कर रहा था, लेकिन दुकानदार का दिल नहीं पिघला। नारायण जी से रहा नहीं गया। उन्होंने दुकानदार से खुद भी बहुत आग्रह किया लेकिन दुकानदार ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। किसान को बीज नहीं मिले!

इस घटना ने नारायण जी को झकझोर दिया। उन्होंने दुकानदार से कहा, “तुमने कहाँ खेती की है मुझे बताओ? कहाँ हैं तुम्हारे खेत? तुम यह बीज कहीं आसमान से थोड़े लाए हो, हम जैसे किसानों ने ही तो तुम्हें यह दिया है। आज तुमने किसानों से औने-पौने दामों में उनका अनाज खरीदा और अब उसी को दुगुने-तिगुने दामों में किसानों को बेच रहे हो, यह कहाँ का इंसाफ है?”

यह एक ऐसा व्यावहारिक कड़वा सच था, जिसे हर कोई जानता था लेकिन कोई इसके खिलाफ बोल नहीं पाता था। नारायण जी समझ गए कि पिछड़े इलाके का फायदा उठाकर व्यापारी गरीब किसानों का शोषण कर रहे हैं।

पढ़ाई छोड़ बीजों को सहेजने का संकल्प

नारायण जी मक्के के बीज को साफ़ कर रहे हैं

यह बात साल 1981 की है। उस समय नारायण जी अपनी पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने तय किया कि वे इस व्यवस्था को बदलेंगे। उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ अपने स्तर पर देसी और जैविक बीजों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। शुरुआत बहुत धीमी और कठिन थी। उस दौर में वे एक साल में मुश्किल से केवल 4 किसानों को ही बीज दे पाते थे। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे लगातार बीजों को सहेजते रहे।

इसी दौरान नारायण जी ने सरकारी नौकरी के लिए भी प्रयास किया। वे परीक्षा में सफल भी हो गए लेकिन चयन नहीं हो पाया। यह उनके जीवन का दूसरा सबसे बड़ा मोड़ था। उन्होंने समझ लिया कि नौकरी के पीछे भागने से अच्छा है कि वे अपने समाज और गरीब किसानों के हक के लिए ज़मीन पर काम करें। उन्होंने समाज की भलाई, अच्छे स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के लिए पूरी तरह से जैविक खेती का रास्ता चुन लिया।

दादाजी से मिला हुनर और प्रकृति का ज्ञान

नारायण जी के साथ मिर्ची रोपण

नारायण जी बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। उनकी एकाग्रता इतनी पक्की थी कि वे जिस चीज़ को एक बार ध्यान से देख लेते थे, उसे तुरंत सीख जाते थे। इसका एक बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब एक दर्जी ने उनका अपमान कर दिया। नारायण जी ने उस अपमान को एक चुनौती की तरह लिया और अपनी लगन के दम पर मात्र 7 दिनों के भीतर खुद एक बेहतरीन दर्जी बन गए।

नारायण जी से जैविक पौधे और बीज लेने आए क्षेत्र के अन्य किसान

उनके भीतर यह लगन और प्रकृति का ज्ञान उनके दादाजी से आया था। उनके दादाजी डूंगरपुर दरबार के एक ‘अगुआ’ (फौजी) थे। बचपन में उनके दादाजी एक कंधे पर नारायण जी को और दूसरे कंधे पर अपनी बंदूक रखकर जंगलों में ले जाते थे। दादाजी ने ही नारायण जी को जंगल के पौधों, पेड़ों और पारंपरिक जड़ी-बूटियों की पहचान कराई थी। दादाजी से मिले इसी ज्ञान का उपयोग नारायण जी आज भी करते हैं। वे पौधों की मदद से फसलों को बीमारियों से बचाते हैं और खुद भी कभी अस्पताल नहीं जाते। उनके घर में आज भी दुर्लभ औषधीय पौधों का एक बड़ा संग्रह है।

नारायण जी की इस खामोश मुहिम में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब समभाव नामक संस्था के सदस्य (रमेश और राकेश) एक दिन उनके घर पहुँचे। उन्होंने नारायण जी के पास मौजूद बीजों के बारे में जानकारी ली और जाँच के लिए कुछ बीज अपने साथ ले गए। जाँच करने पर पता चला कि यह पारम्परिक जैविक बीज हैं। संस्था के लोग यह देखकर हैरान रह गए कि एक किसान ने बिना किसी वैज्ञानिक लैब के इतने शुद्ध बीज बचा कर रखे हैं! पूछने पर नारायण जी ने अपने पीढ़ियों पुराने ज्ञान की ओर इशारा किया।

वस्तु विनिमय आधारित बीज बैंक

आज नारायण जी के पास अपना एक व्यक्तिगत बीज बैंक है, जिसमें 400 से ज़्यादा पारंपरिक जैविक बीजों की किस्में सुरक्षित हैं। वे इन बीजों का उत्पादन खुद अपने खेतों में करते हैं ताकि शुद्धता बनी रहे। वे किसी भी किसान से बीज के बदले पैसे नहीं लेते, बल्कि वस्तु विनिमय का उपयोग करते हैं।

बीजों का बारीकी से निरिक्षण

इसका मतलब यह है कि अगर कोई किसान उनके बैंक से 10 किलो बीज ले जाता है, तो फसल पकने के बाद वह वापस 10 किलो शुद्ध बीज बैंक में लाकर जमा कर देता है। इससे बीज बैंक का संतुलन बना रहता है और गरीब किसान पर बाज़ार का कोई कर्ज नहीं चढ़ता। नारायण जी अपने देसी बीज किसानों के अलावा किसी भी बिचौलिए या दुकानदार को कभी नहीं देते। उनका मानना है कि अगर वे यह बीज दुकानदारों को देंगे, तो वे फिर से उसे दुगुने दामों में बेचकर किसानों का शोषण करेंगे।

वस्तु विनियम का हिसाब-किताब!

 मिश्रित खेती और समाज सुधार

मिश्रित खेती और समाज सुधार

अपनी खेती के साथ-साथ, नारायण जी एक बड़े समाज सुधारक की भूमिका भी निभा रहे हैं। जब भी वे मुक्त होते हैं, वे अलग-अलग क्षेत्रों में किसानों की बैठकें लेते हैं। इन बैठकों में वे लोगों को मिश्रित खेती करने की सलाह देते हैं, जिसमें एक साथ कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं ताकि अगर एक फसल खराब भी हो जाए, तो दूसरी फसल से किसान का मुनाफा बना रहे।

वे लोगों को समाज में रहने का सही तरीका सिखाते हैं, शराब से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं और घर में पशुधन रखने पर ज़ोर देते हैं। पशुओं से मिलने वाला गोबर खेतों के लिए जैविक खाद का काम करता है, जिससे बाज़ार से रासायनिक खाद खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

नई पीढ़ी को संदेश और भविष्य का संकल्प

नारायण जी आज की नई पीढ़ी को एक गंभीर संदेश देना चाहते हैं। उनका कहना है कि मिलावटी वाले खाने से इंसानों की उम्र घटकर सिर्फ 60 से 70 साल रह गई है। अगर बीमारियों से मुक्त रहना है और लंबी जिंदगी जीनी है, तो हमें वापस अपनी पारंपरिक खान-पान की आदतों और जैविक खेती की तरफ लौटना होगा।

खूंटियों पर टंगे बीज

नारायण जी का यह प्रयास आज भी लगातार जारी है और उनका संकल्प है कि आने वाले कुछ ही सालों में वे डूंगरपुर और बांसवाड़ा के हर एक किसान को पूरी तरह से जैविक खेती से जोड़ देंगे। यह संभव होता दिखता है। कुछ संगी-साथी मिल जाएँ तो क्या नहीं संभव! उनके विनम्र छप्पर के घर में बना विशाल बीज भण्डार इसका सुन्दर प्रमाण है!

यह लेख सुधीर और खुशबू ने समभाव के साथ 2026 में इंटर्नशिप के दौरान लिखा।

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