लेखक: सुधीर सैनी ओर खुशबू कुमावत
स्थान: टकारी, डूंगरपुर (राजस्थान)
डूंगरपुर के टकारी गाँव के अभय सिंह ने बी.टी. कॉटन और तरबूज की रासायनिक खेती से इतना कमाया कि पूरा इलाका उन्हें ‘वॉटरमेलन मैन’ के नाम से जानने लगा। फिर बीमारी ने घेरा, और खेत की मेड़ पर बैठकर उन्होंने देखा कि पुरखों की उपजाऊ मिट्टी पत्थर जैसी बेजान हो चुकी है। उसी दिन से शुरू हुआ ज़हर से अमृत की ओर लौटने का सफ़र — तालाब की मिट्टी से खेत को नया जीवन देना, गाँव-गाँव से देसी बीज जुटाना, और वस्तु विनियम आधारित एक बीज बैंक खड़ा करना।
हरित क्रांति का प्रभाव और हाइब्रिड खेती की शुरुआत
राजस्थान के डूंगरपुर जिले में एक छोटा सा गाँव है टकारी। पहले टकारी एक ऐसा गाँव था जिसके बारे में बाहर के लोग ज़्यादा नहीं जानते थे। वह एक शांत और सीधा-साधा गाँव था, लेकिन समय के साथ वहाँ धीरे-धीरे आधुनिक बदलाव आने लगे। इसी गाँव में दो भाई रहते थे, 48 साल के अभय सिंह और उनके बड़े भाई रायचंद। दोनों भाई बचपन से ही खेतों की मिट्टी में पले-बढ़े थे और मिलकर अपने पुरखों की ज़मीन पर खेती करते थे। उनके माता-पिता ने उन्हें विरासत में एक ऐसी ज़मीन दी थी जो बेहद उपजाऊ और अच्छी थी। लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक की ‘हरित क्रांति’ के बाद पूरे देश के बाज़ार में एक नई हवा चल रही थी। हर तरफ पारंपरिक खेती को छोड़कर हाइब्रिड बीजों, रासायनिक खादों और कीड़े मारने वाली दवाओं का प्रचार हो रहा था। हर किसान के दिमाग में यह बात डाल दी गई थी कि अगर ज़्यादा पैसा कमाना है, तो पुरानी खेती छोड़नी होगी।
अभय सिंह और उनके भाई भी इस मुनाफे के चक्कर में आ गए। वे अपने पूरे क्षेत्र के पहले ऐसे किसान बने जिन्होंने पारंपरिक तरीकों को छोड़ दिया और पड़ोसी राज्य गुजरात जाकर ‘बी.टी. कॉटन’ (कपास) की अकार्बनिक और रासायनिक खेती की शुरुआत की। बी.टी. कॉटन एक ऐसा संकर बीज है जिसे प्रयोगशाला में इस तरह तैयार किया जाता है कि उसमें कीड़े न लगें, लेकिन इसे उगाने के लिए बहुत ज़्यादा रासायनिक खादों और पानी की ज़रूरत होती है। गुजरात में गाँव के ही कुछ रसूखदार लोगों ने अभय सिंह की बहुत मदद की। उन लोगों ने इन्हें बी.टी. कॉटन के बीज दिलाए और खेतों में रसायन छिड़कने का तरीका सिखाया। शुरुआत में इन रसायनों का असर बहुत अच्छा दिखा। खेतों में इतनी भारी फसल हुई कि दोनों भाइयों ने उम्मीद से कहीं ज़्यादा पैसा कमाया। घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई और पूरे गाँव में उनकी इस नई खेती की चर्चा होने लगी।
‘वॉटरमेलन मैन’ की सफलता और बाज़ार का रेवेन्यू
कपास की इस सफलता के बाद, अभय सिंह ने एक और बड़ा रिस्क लेने का फैसला किया। उन्होंने उसी कीटनाशक से प्रभावित हो चुकी ज़मीन पर 4.5 बीघा में तरबूज की खेती शुरू कर दी। तरबूज की पहली ही फसल से उन्हें 4.5 लाख रुपये की कमाई हुई। जब टकारी गाँव के दूसरे किसानों ने देखा कि अभय सिंह ने कपास के बाद तरबूज से इतना मुनाफा कमाया है, तो गाँव के अन्य किसानों ने भी अपने-अपने खेतों में तरबूज उगाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते टकारी गाँव पूरे ज़िले में तरबूज का सबसे बड़ा केंद्र बन गया और आगे चलकर पूरे गाँव ने मिलकर तरबूज की फसल से 1 करोड़ रुपये कमाए। अभय सिंह की इस कामयाबी के कारण अखबारों में इस पर एक रिपोर्ट छपी और अभय सिंह को पूरे इलाके में वॉटरमेलन मैन के नाम से जाना जाने लगा। तरबूज के साथ ही उन्होंने उसी ज़मीन के 2.5 बीघा हिस्से में टमाटर की खेती भी की थी, जिससे उन्हें 70 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई हुई थी। अब वे आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो चुके थे और हर कोई उन्हें एक सफल आधुनिक किसान मान रहा था।

शारीरिक संकट और जीवन में बदलाव
इस आर्थिक कामयाबी और पैसों की चमक के बीच, अभय सिंह के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया। एक गंभीर दुर्घटना ने उन्हें शारीरिक रूप से तोड़ दिया। इस हादसे से पहले वे अपनी सेहत और खान-पान पर ध्यान नहीं देते थे, बाज़ार में जो भी मिलता था, खा लेते थे। लेकिन उम्र के इस पड़ाव के भारी मानसिक व शारीरिक तनाव के कारण उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो गई। बाज़ार के मिलावटी भोजन ने उनके शरीर पर इतना बुरा असर डाला कि उन्हें ‘मधुमेह’ की बीमारी ने घेर लिया। इस बीमारी के कारण उनका वजन लगातार गिरने लगा और शरीर में हर समय कमज़ोरी रहने लगी। इस व्यक्तिगत संकट ने अभय सिंह को सोचने पर मजबूर कर दिया। वे बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचने लगे कि जो खाना हम रोज़ खा रहे हैं, वह कोई पोषण नहीं है, बल्कि वह तो हमें अंदर से खोखला करने वाला धीमा ज़हर है। वे समझ गए कि इंसान का शरीर वैसा ही बनता है, जैसा अन्न वह खाता है।
जैविक कृषि की ओर वापसी
इस बीमारी और शारीरिक कष्ट ने अभय सिंह को एक नई राह दिखाई। एक दिन जब वे ठीक होने के बाद अपने खेत की मेड़ पर बैठे थे, तो उन्होंने ध्यान से अपनी मिट्टी को देखा। बरसों तक अंधाधुंध कीटनाशकों के कारण उनकी उपजाऊ ज़मीन अब धीरे-धीरे अंदर से खोखली, पत्थर जैसी कड़क और बेजान हो चुकी थी। मिट्टी का रंग बदल चुका था और वह पूरी तरह रासायनिक खादों की आदी हो चुकी थी। अभय सिंह की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने अपने भाई से कहा कि यह ज़मीन हमें अपने माता-पिता से एक अनमोल और पवित्र धरोहर के रूप में मिली थी, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुज़ार दी लेकिन कभी इस मिट्टी में ज़हर नहीं घोला और आज हम दोनों भाई मिलकर चंद पैसों के लालच में इस धरती माँ को धीरे-धीरे मार रहे हैं! उन्होंने अपने भाई के सामने एक व्यावहारिक सवाल रखा कि हम तो अपनी जिंदगी इस पैसे के दम पर जैसे-तैसे काट लेंगे, लेकिन जब यह ज़मीन पूरी तरह बंजर बन जाएगी, तो हमारी आने वाली पीढ़ी और हमारे बच्चे इस मिट्टी से क्या उगाएंगे, वे क्या खाएंगे और कैसे जिंदा रहेंगे! उसी पल उन्होंने फैसला लिया कि अब चाहे जो हो जाए, वे अपने खेतों में रासायनिक कीटनाशक और खादें डालना बिल्कुल बंद कर देंगे और वापस पुराने तरीके से जैविक खेती की तरफ लौटेंगे।

जैविक खेती का मतलब है ऐसी खेती जिसमें किसी भी प्रकार के बनावटी रसायन या दवाओं का उपयोग न हो, बल्कि केवल गोबर, केंचुए की खाद और प्राकृतिक तरीकों से मिट्टी को उपजाऊ बनाया जाए। लेकिन यह फैसला करना जितना आसान था, ज़मीन पर उतारना उतना ही मुश्किल था। यहाँ एक और बड़ी समस्या सामने आई। बरसों तक रसायनों के इस्तेमाल से मिट्टी के अंदर के सारे मित्र जीवाणु और केंचुए मर चुके थे, जो मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषित करते हैं। जब शुरुआत में उन्होंने रसायन डालना बंद किया, तो ज़मीन ने साधारण गोबर की खाद को स्वीकार करने से ही मना कर दिया। ज़मीन जैसे किसी नशे में थी, जिसे अचानक रसायन मिलना बंद हो गया हो। नतीजा यह हुआ कि फसलें पीली पड़कर सूखने लगीं और पैदावार बिल्कुल गिर गई। लेकिन अभय सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मिट्टी को सुधारने के लिए एक अलग कदम उठाया। गाँव के पास एक पुराना और बड़ा तालाब था, जिसका नाम था ‘खाखरा तालाब’। उस तालाब के नीचे सालों से पहाड़ों और जंगलों से बहकर आई पोषक तत्वों से भरपूर उपजाऊ मिट्टी जमा थी। अभय सिंह ने ट्रैक्टर-ट्रॉली उठाई और कड़ी मेहनत करके उस खाखरा तालाब से करीब 250 ट्रॉली मिट्टी खुदवाकर अपने खेतों में बिछवा दी। इस काम में बहुत मेहनत और पैसा लगा, लेकिन इस नई और शुद्ध मिट्टी ने उनके खेतों को एक नया जीवनदान दे दिया और उनकी मिट्टी फिर से सांस लेने लगी।
कृषि विशेषज्ञों का सहयोग और पारंपरिक बीजों का ज्ञान
जब कोई इंसान सच्चे दिल से मिट्टी को बचाने की इस मुहिम में लगता है, तो उसे दूसरों का साथ भी मिलने लगता है। अभय सिंह के इस नए सफ़र और ज्ञान को बढ़ाने में स्थानीय कृषि पर्यवेक्षक लाल सिंह चौहान ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाल सिंह चौहान ने सरकारी अधिकारी होने के बावजूद अभय सिंह के भीतर के सच्चे किसान को पहचाना और उनका मार्गदर्शन किया। वे अभय सिंह को लेकर अलग-अलग कृषि और बीज मेलों में गए, सरकार के सेमिनार में ले गए, और पारंपरिक बीजों का गहरा व्यावहारिक ज्ञान दिलाने के लिए उन्होंने अभय सिंह को लगभग पूरे राजस्थान का दौरा करवाया। इस दौरे से अभय सिंह को समझ आया कि हमारे पुराने देसी बीजों में मौसम की हर मार, सूखे और बीमारियों को झेलने की कितनी अद्भुत क्षमता होती है, जबकि हाइब्रिड बीज हर मौसम में काम नहीं आते।
इसी बदलाव के दौर में, भीलवाड़ा के एक बड़े समाजसेवी रामराय को भी अभय सिंह के इस संघर्ष के बारे में पता चला। रामराय यह जानकर हैरान थे कि डूंगरपुर के एक छोटे से गाँव टकारी में एक किसान अपनी ज़मीन को बचाने के लिए इतनी बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। चूँकि डूंगरपुर के ही रहने वाले एक और बड़े कृषि विशेषज्ञ और समाजसेवी, आशीष, पहले से ही उस क्षेत्र में जैविक खेती और पुराने देसी बीजों को बचाने के लिए काम कर रहे थे, इसलिए रामराय ने ही अभय सिंह और आशीष की आपस में मुलाकात करवाई। रामराय और आशीष तुरंत अभय सिंह से मिलने उनके गाँव टकारी आ पहुँचे। जब उन्होंने अभय सिंह की लगन को देखा, तो वे उनके प्रशंसक हो गए। आशीष ने अभय सिंह का हाथ थामा और उनकी मुहीम में भागिदार बन गए।
ओडिशा यात्रा और ऑर्गेनिक बीजों का महत्व
इसके बाद, आशीष और रामराय अभय सिंह को अपने साथ भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा की यात्रा पर ले गए। अभय सिंह वहाँ एक महीने तक रहे। उन्होंने ओडिशा के दूर-दराज के आदिवासी गाँवों का दौरा किया और वहाँ के स्थानीय किसानों की जीवनशैली को देखा। वहाँ उन्होंने देखा कि किसान बिना किसी रासायनिक खाद या महंगी दवाओं के, सिर्फ अपने पुराने देसी बीजों के दम पर पौष्टिक खेती कर रहे थे। वहाँ की ज़मीन आज भी उतनी ही मुलायम, शुद्ध और उपजाऊ थी, जैसी सदियों पहले हुआ करती थी। आशीष ने उन्हें समझाया कि असली ताकत कंपनियों के इन चमकीले पैकेट वाले हाइब्रिड बीजों में नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी के अपने देसी और ऑर्गेनिक बीजों में है। हाइब्रिड बीज हर साल बाज़ार से महंगे दामों पर खरीदने पड़ते हैं और उन्हें उगाने के लिए रसायनों का सहारा लेना ही पड़ता है, जबकि देसी बीजों को किसान खुद अपने घर पर तैयार कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ऑर्गेनिक बीज इंसानी शरीर और प्रकृति दोनों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। जब हम ऑर्गेनिक बीजों से बिना किसी केमिकल के फसल उगाते हैं, तो उस अनाज में प्राकृतिक रूप से विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा भरपूर होती है, जिसे हमारा शरीर आसानी से पचा लेता है और हमें कैंसर या शुगर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाता है। दूसरी तरफ, ये बीज प्रकृति को भी कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। देसी बीज स्थानीय पर्यावरण और मौसम के साथ तालमेल बिठाकर उगते हैं, जिससे इन्हें न तो ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है और न ही महंगे पेस्टीसाइड की। इसका नतीजा यह होता है कि मिट्टी के अंदर रहने वाले मित्र केंचुए और जीवाणु सुरक्षित रहते हैं, हवा और पानी शुद्ध बने रहते हैं, और प्रकृति का पूरा चक्र बिना किसी नुकसान के सही तरीके से चलता रहता है। आशीष जैसा-जैसे गाइड करते गए, अभय सिंह ने ठीक वैसा-वैसा आगे काम करना शुरू कर दिया।
देसी बीज बैंक की स्थापना और वस्तु विनिमय
ओडिशा से लौटने के बाद अभय सिंह के भीतर एक नई ऊर्जा थी। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर किसानों के साथ बैठकें कीं। उन्होंने केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और पूरे डूंगरपुर जिले के कोने-कोने से घूम-घूमकर पुराने देसी बीजों को इकट्ठा करने का एक अभियान शुरू किया। उन्होंने अकेले धान की ही 21 विभिन्न पारंपरिक और देसी किस्में खोजकर अपने पास जमा कर लीं। किसानों को इन देसी बीजों को अपनाने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने ‘देसी बीज बैंक’ बनाया और ‘वस्तु विनिमय’ (यानी बीज के बदले बीज) की एक बेहद सरल नीति आशीष के साथ मिलकर निकाली। वे किसानों से कहते कि तुम्हें इस बीज का एक भी पैसा नहीं देना है, तुम हमारे इस बैंक से अपनी पसंद का कोई भी देसी बीज बिल्कुल मुफ्त ले जाओ। बस शर्त इतनी है कि जब तुम्हारी फसल पककर तैयार हो जाए, तो जितना किलो बीज तुम हमसे ले गए थे, उतना ही किलो शुद्ध बीज फसल कटने के बाद हमारे इस बैंक में वापस लाकर जमा करवा देना, ताकि कोई दूसरा किसान भी उसे ले जा सके। शुरुआत में किसानों ने पूरी तरह जैविक खेती पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए एक बीच का रास्ता चुना, वे अपने खुद के परिवार के खाने के लिए तो बिना ज़हर वाली जैविक फसल उगाने लगे, लेकिन बाज़ार में बेचने के लिए उन्होंने पुराना रासायनिक तरीका ही जारी रखा, क्योंकि बाज़ार में आज भी रासायनिक फसलों की मांग और दिखावट ज़्यादा है। लेकिन यह बदलाव की एक ठोस शुरुआत थी।
व्यक्तिगत स्वास्थ्य में सुधार और भविष्य का संदेश
इस पूरे आंदोलन के साथ-साथ, अभय सिंह ने अपनी खुद की सेहत पर भी एक बड़ा प्रयोग किया। उन्होंने कड़ा नियम बनाया कि अब उनकी रसोई में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ जैसे अनाज, दालें, मसाले और सब्जियाँ, वे अपने ही खेत में पूरी तरह जैविक तरीके से उगाएंगे। उन्होंने अपने खेत के एक हिस्से में प्राकृतिक और आयुर्वेदिक औषधीय पौधे भी लगाए। शुद्ध खान-पान, प्राकृतिक दिनचर्या और इन घरेलू जड़ी-बूटियों की मदद से उन्होंने अपनी शुगर की बीमारी को बिना किसी महंगी अंग्रेजी दवा के पूरी तरह से ठीक कर लिया और फिर से तंदरुस्त हो गए। जब आस-पास के लोगों ने देखा कि अभय सिंह ने खुद को ठीक कर लिया है, तो लोग उनसे सेहत की सलाह लेने आने लगे। अब अभय सिंह किसानों के साथ-साथ आम बीमार लोगों को भी सेहतमंद रहने के लिए जागरूक करने लगे कि अगर अपने बच्चों को बीमारियों से बचाना है, तो खेतों में ज़हर डालना बंद करना होगा। आज टकारी गाँव बदल रहा है। ‘वॉटरमेलन मैन’ से लेकर ‘बीज रक्षक’ बनने तक की अभय सिंह की यह ‘ज़हर से अमृत की ओर’ लौटने की यात्रा आने वाली कई पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक की तरह काम करती रहेगी।
अभय सिंह की यह कहानी साबित करती है कि प्रकृति और कृषि का रिश्ता केवल तुरंत मिलने वाले मुनाफे का नहीं है, बल्कि ज़मीन और इंसानी सेहत की सुरक्षा का है। जब एक किसान अपनी मिट्टी की पुकार सुनता है, तो वह केवल फसल नहीं उगाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन सुरक्षित करता है।
यह लेख सुधीर और खुशबू ने समभाव के साथ 2026 में इंटर्नशिप के दौरान लिखा।
