(फील्डवर्क आधारित लेख)
लेखक – टीना गौड़
प्रस्तावना
राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थल में पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यहाँ का प्रत्येक गाँव, प्रत्येक ढाणी और प्रत्येक परिवार पानी के महत्व को केवल समझता ही नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन का सबसे मूल्यवान हिस्सा मानता है। जहाँ वर्षा अत्यंत कम होती है और भूजल का अधिकांश भाग खारा होता है, वहाँ मीठे पानी का प्रत्येक स्रोत किसी वरदान से कम नहीं माना जाता। इसी आवश्यकता ने यहाँ के लोगों को प्रकृति के साथ संघर्ष करना नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को समझना सिखाया। सदियों के अनुभव और निरंतर अभ्यास से उन्होंने ऐसी अनेक जल संरचनाएँ विकसित कीं, जिनमें नाड़ी, टांका, कुई और बेरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें बेरी एक ऐसी संरचना है, जो रेतीली धरती के भीतर छिपे मीठे जल को अत्यंत वैज्ञानिक और पारंपरिक तरीके से सुरक्षित रखने का कार्य करती है।

मेरे फील्डवर्क के दौरान मुझे बाड़मेर जिले के गीड़ा क्षेत्र में रहने वाले अनुभवी लोक कारीगर श्री जमालदीन ख़ान से मिलने का अवसर मिला। लगभग बासठ वर्ष की आयु में भी उनके चेहरे पर वही आत्मविश्वास दिखाई देता है, जो किसी कुशल शिल्पकार के भीतर वर्षों के अनुभव से पैदा होता है। उन्होंने लगभग चालीस वर्षों तक बेरी निर्माण का कार्य किया है। आज भले ही उन्होंने नियमित रूप से यह कार्य करना छोड़ दिया हो, लेकिन आसपास के गाँवों में जब भी किसी नई बेरी के निर्माणकी बात होती है, तो लोग आज भी सबसे पहले उन्हीं की सलाह लेने पहुँचते हैं। उनसे हुई बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि बेरी का निर्माण केवल मजदूरी का कार्य नहीं है, बल्कि यह धरती, पानी और स्थानीय पर्यावरण को गहराई से समझने वाली एक विशिष्ट लोक-विद्या है।
बेरी निर्माण के लिए स्थान का चयन
बेरी बनाने का कार्य कभी भी सीधे खुदाई से प्रारंभ नहीं होता। सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है—उपयुक्त स्थान का चयन। यदि स्थान का चुनाव गलत हो जाए, तो महीनों की मेहनत और हजारों रुपये व्यर्थ हो सकते हैं। इसलिए अनुभवी कारीगर सबसे पहले उस क्षेत्र की मिट्टी, भूमि की बनावट, आसपास की पुरानी बेरियों और पानी की प्रकृति का सावधानीपूर्वक अध्ययन करते हैं।
जमालदीन जी के अनुसार बेरी बनाने के लिए धोरे, यानी रेतीले टीले, सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। इन टीलों की महीन रेत वर्षा के जल को धीरे-धीरे अपने भीतर सोख लेती है। यह पानी कई परतों से छनकर नीचे पहुँचता है और मीठा बना रहता है। इसके विपरीत यदि बेरी ऐसी भूमि पर बनाई जाए जिसे स्थानीय भाषा में तालर कहा जाता है, तो वहाँ खारा पानी मिलने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए केवल जमीन देखकर खुदाई शुरू कर देना उचित नहीं माना जाता। पहले यह समझना आवश्यक होता है कि धरती के भीतर पानी किस प्रकार व्यवहार करता है।
बेरी निर्माण की प्रक्रिया
उपयुक्त स्थान निश्चित हो जाने के बाद बेरी की गोल आकृति चिन्हित की जाती है और स्थानीय औज़ार पावड़ा की सहायता से खुदाई प्रारंभ होती है। प्रारंभिक खुदाई पूरी तरह हाथों से की जाती है। धीरे-धीरे मिट्टी हटती जाती है और गोलाकार गड्ढा गहराई की ओर बढ़ता जाता है। सामान्यतः लगभग पंद्रह से सत्रह फुट तक खुदाई करने के बाद बेरी की पक्की दीवार तैयार करने का कार्य प्रारंभ किया जाता है। यही वह चरण है जहाँ एक साधारण गड्ढा धीरे-धीरे एक मजबूत जल संरचना का रूप लेने लगता है।
बेरी की पक्की गोल दीवार को स्थानीय कारीगर कोठी कहते हैं। इस कोठी को बनाने के लिए लोहे की दो बड़ी गोल चादरों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें स्थानीय भाषा में फ़रमा या कुंडी कहा जाता है। दोनों लोहे की चादरों को एक निश्चित दूरी पर रखकर उनके बीच लगभग दो से चार इंच का खाली स्थान छोड़ा जाता है। फिर दोनों को मजबूत कुंडों की सहायता से कस दिया जाता है ताकि वे हिल न सकें। इसके बाद इस खाली स्थान में सीमेंट, बजरी और छोटे पत्थरों का मिश्रण सावधानीपूर्वक भरा जाता है। यही मिश्रण बाद में पूरी बेरी की मजबूत दीवार बन जाता है।



जमालदीन जी ने बताया कि एक दिन में केवल एक ही फ़रमा भरा जाता है। गर्मियों के दिनों में तेज धूप के कारण यह लगभग छह घंटे में पर्याप्त मजबूत हो जाता है, जबकि सर्दियों में यही कार्य पूरा एक दिन ले लेता है। फ़ारमा अच्छी तरह जम जाने के बाद उसे खोला जाता है और उसके ऊपर अगला फ़रमा लगाया जाता है। यही प्रक्रिया प्रतिदिन दोहराई जाती है। यदि बेरी पंद्रह फ़रमों की बननी है, तो केवल इस कार्य में लगभग पंद्रह दिन लग जाते हैं। दूर से देखने पर यह कार्य धीमा प्रतीत होता है, लेकिन कारीगरों के अनुसार जल्दबाज़ी करना पूरी संरचना को कमजोर बना सकता है।
यहीं तक पहुँचने पर मुझे लगा कि शायद अब बेरी लगभग तैयार हो गई होगी, लेकिन जमालदीन मुस्कुराने लगे, बोले, “असल काम तो अब शुरू होता है। पानी दिख जाए, इसका मतलब यह नहीं कि बेरी तैयार हो गई।”
उनकी यह बात सुनकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई, क्योंकि आगे जो प्रक्रिया उन्होंने बताई, वही बेरी निर्माण की सबसे कठिन, सबसे जोखिमभरी और सबसे अद्भुत प्रक्रिया है…जब पानी दिखाई देता है, तभी शुरू होती है असली परीक्षा बेरी! में पानी दिखाई देना काम का अंत नहीं, बल्कि सबसे कठिन चरण की शुरुआत है!
पानी के भीतर निर्माण की प्रक्रिया
जब प्रारम्भिक खुदाई के बाद बेरी के भीतर पानी आने लगता है, तब भी खुदाई का कार्य लगातार जारी रहता है। उस समय कारीगर केवल इतना देखकर काम नहीं रोकते कि पानी मिल गया है। वे सबसे पहले पानी के स्वाद, उसकी मात्रा और धरती की परतों को समझते हैं। यदि पानी पर्याप्त मीठा मिल रहा हो, तो अनावश्यक रूप से अधिक गहराई तक नहीं खोदा जाता, क्योंकि कई बार अधिक नीचे जाने पर मीठे पानी की जगह खारा पानी मिलने लगता है। इसलिए अनुभवी कारीगरों का लक्ष्य केवल गहराई बढ़ाना नहीं होता, बल्कि मीठे पानी को सुरक्षित रखना होता है।
फिर भी एक नियम लगभग हर बेरी में समान रहता है। चाहे पानी जल्दी मिल जाए या थोड़ी देर से, कम-से-कम पाँच कुंडियाँ (फ़रमे) पानी के भीतर अवश्य उतारी जाती हैं। इसका उद्देश्य बेरी की मजबूती बनाए रखना और जल स्रोत को स्थिर करना होता है। यदि पानी की आवश्यकता अधिक हो तो बेरी को परिस्थितियों के अनुसार और भी गहरा ले जाया जाता है।
यहीं से निर्माण का सबसे कठिन और जोखिमभरा चरण आरम्भ होता है। अब तक जो खुदाई सूखी मिट्टी में हो रही थी, वह पूरी तरह पानी के भीतर होने लगती है। यह ऐसा कार्य है जिसे हर व्यक्ति नहीं कर सकता। जमालदीन जी के अनुसार पानी के भीतर उतरने वाला कारीगर केवल मजदूर नहीं होता, बल्कि वर्षों का अनुभव रखने वाला विशेषज्ञ होता है। यदि अनुभव न हो, तो पानी के भीतर काम करना जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है।
उन्होंने बताया कि इस समय सामान्यतः दो अनुभवी कारीगर बेरी के भीतर उतरते हैं। पानी के भीतर दृश्य लगभग शून्य होता है। मिट्टी घुल जाने के कारण कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता। इसलिए कारीगर आँखें बंद करके ही काम करते हैं। वे अपने हाथों के स्पर्श, शरीर के संतुलन और वर्षों के अनुभव के आधार पर यह समझते हैं कि कहाँ से मिट्टी निकालनी है और किस दिशा में आगे बढ़ना है।
कुछ समय तक लगातार पानी के भीतर काम करने के बाद साँस लेना कठिन होने लगता है। तब एक कारीगर ऊपर आकर कुछ देर विश्राम करता है और दूसरा तुरंत उसकी जगह पानी के भीतर उतर जाता है। इस प्रकार दोनों बारी-बारी से कार्य करते रहते हैं। ऊपर खड़े लोगों को केवल इतना दिखाई देता है कि एक व्यक्ति बाहर आया और दूसरा भीतर चला गया, लेकिन पानी के नीचे चल रही मेहनत, अँधेरा और जोखिम केवल वही दो कारीगर जानते हैं। यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक आवश्यक गहराई प्राप्त नहीं हो जाती।
जब बेरी की पक्की कोठी अपने भार से धीरे-धीरे नीचे धँसती जाती है, तब उसके ऊपर पुनः नया फ़रमा लगाया जाता है और अगली कुंडी तैयार की जाती है। इस प्रकार एक ओर नीचे पानी के भीतर खुदाई चलती रहती है और दूसरी ओर ऊपर नई कुंडियाँ बनती रहती हैं। दोनों कार्य साथ-साथ चलते हैं। यही कारण है कि बाहर से देखने पर भले ही कार्य धीमा लगे, लेकिन वास्तव में बेरी का प्रत्येक इंच अत्यंत सावधानी और धैर्य से तैयार किया जाता है।

जमालदीन ख़ान जी ने बताया कि बाड़मेर क्षेत्र में सामान्यतः एक दिन में एक फ़ारमा तैयार किया जाता है। यदि बेरी लगभग पंद्रह फ़रमों की बननी हो, तो केवल कुंडियाँ बनाने में ही पंद्रह दिन लग जाते हैं। इसके बाद पानी के भीतर की खुदाई, सफाई और अन्य कार्य मिलाकर पूरी बेरी तैयार होने में लगभग पंद्रह से तीस दिन का समय लग जाता है। लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि जैसलमेर की भूमि इससे बिल्कुल अलग है। वहाँ की कठोर एवं जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एक बेरी को पूर्ण रूप से तैयार होने में कई बार दो से तीन वर्ष तक लग जाते हैं। यह अंतर केवल समय का नहीं, बल्कि भूमि की प्रकृति का भी है।
पानी के भीतर होने वाला यह पूरा कार्य अत्यंत धैर्य, साहस और अनुभव की माँग करता है। आधुनिक मशीनें आज अनेक कठिन कार्यों को आसान बना चुकी हैं, लेकिन बेरी निर्माण का यह चरण आज भी मुख्य रूप से कारीगरों के अनुभव पर ही निर्भर करता है।
कार्य अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। बेरी निर्माण की सबसे अद्भुत प्रक्रिया अभी भी शेष रहती है। जब पक्की कोठी पूरी तरह तैयार हो जाती है, तब उसके भीतर आडानाळिया बनाई जाती है। यही वह तकनीक है जो बेरी तक धरती की गहराइयों से मीठे पानी को निरंतर पहुँचाती है और एक साधारण बेरी को असाधारण जल संरचना में बदल देती है।
आडानाळिया की पारंपरिक एवं आधुनिक तकनीक
जमालदीन ख़ान जी के अनुसार यदि किसी बेरी से अधिक मात्रा में पानी प्राप्त करना हो, तो आडानाळिया का कार्य सबसे अधिक सावधानी से किया जाता है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक बेरी में आडानाळिया नहीं बनाई जाती। यदि बेरी केवल घर के उपयोग और पीने के पानी के लिए बनाई जा रही हो तथा उपलब्ध जल पर्याप्त हो, तो सामान्यतः आडानाळिया की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसी बेरी सीमित मात्रा में जल देती है, जो घरेलू उपयोग के लिए पर्याप्त माना जाता है। किन्तु यदि उद्देश्य खेती, पशुपालन अथवा अधिक मात्रा में जल प्राप्त करना हो, तब अड़ानळिया बनाना अनिवार्य हो जाता है। यही प्रक्रिया बेरी के चारों ओर फैली हुई जलधाराओं को मुख्य जलस्रोत से जोड़ने का कार्य करती है।
जब बेरी की पक्की कोठी तैयार हो जाती है, तब उसके निचले भाग में चारों ओर ऐसे स्थान खोजे जाते हैं जहाँ से पानी के आने की संभावना अधिक होती है। वर्षों के अनुभव से कारीगर यह पहचान लेते हैं कि किस दिशा में धरती के भीतर जल का प्रवाह अधिक है। उन स्थानों पर पक्की दीवार में सावधानीपूर्वक छोटे-छोटे छेद बनाए जाते हैं। यही छेद आगे चलकर आडानाळिया का मार्ग बनते हैं।
वर्तमान समय में इस कार्य के लिए लगभग तीन-तीन फुट लंबी प्लास्टिक की पाइपों का उपयोग किया जाता है। पहली पाइप दीवार के छेद में डाली जाती है। उसके पीछे दूसरी पाइप जोड़ी जाती है, फिर तीसरी, फिर चौथी। इस प्रकार पाइपों की एक लंबी श्रृंखला तैयार होती जाती है। लेकिन केवल पाइप लगाने से काम पूरा नहीं होता। पाइप को धरती के भीतर आगे बढ़ाने के लिए मोटर का सहारा लिया जाता है।
जमालदीन जी ने बताया कि लगभग पचास फुट लंबी मोटर की पाइप इस प्लास्टिक पाइप से जोड़ी जाती है। जैसे ही मोटर चलाई जाती है, तेज़ दबाव से निकलता पानी सामने की मिट्टी को काटने लगता है। मिट्टी धीरे-धीरे हटती जाती है और पाइप अपने आप धरती के भीतर चला जाता है। जहाँ तक पाइप पहुँचती है, वहाँ तक पानी के आने का नया मार्ग तैयार हो जाता है। फिर उसके पीछे अगली पाइप जोड़ दी जाती है। यह क्रम लगातार चलता रहता है, जब तक कारीगर को यह विश्वास न हो जाए कि आसपास की जलधाराओं तक मार्ग बन चुका है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दो अनुभवी कारीगर बेरी के भीतर कार्य करते हैं। एक कारीगर पाइप को सही दिशा में पकड़कर रखता है, जबकि दूसरा मिट्टी हटाने और पाइप को आगे बढ़ाने का कार्य करता है। यह पूरा काम भी पानी के भीतर ही होता है। पानी इतना गंदला होता है कि आँखें खोलने पर भी कुछ दिखाई नहीं देता!
यह जानना ज़रूरी है कि आडानाळिया केवल निर्माण के समय ही बनाई जा सकती है। यदि बेरी पूरी तरह तैयार होने के बाद किसी को लगे कि अब आडानाळिया डालनी चाहिए, तो ऐसा करना लगभग असंभव हो जाता है। इसका कारण यह है कि बेरी की पक्की कोठी और बाहर की मिट्टी के बीच लगभग चार से पाँच इंच का जो खाली स्थान रहता है, उसे अंत में मिट्टी भरकर पूरी तरह बंद कर दिया जाता है ताकि पूरी संरचना मजबूत बनी रहे। एक बार यह स्थान भर जाने के बाद वहाँ तक दोबारा पहुँचना संभव नहीं रहता। इसलिए अनुभवी कारीगर निर्माण के समय ही इस कार्य को पूरा कर लेते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लोग अक्सर जाली और आडानाळिया को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों का उद्देश्य अलग-अलग है। जाली का कार्य बाद में भी किया जा सकता है, क्योंकि वह बेरी के भीतर पानी के प्रवाह को व्यवस्थित करने और मिट्टी को रोकने में सहायता करती है। लेकिन अड़ानळिया बाद में नहीं बनाई जा सकती।
जमालदीन जी ने अपने जीवन की शुरुआत इस कार्य से की थी, तब न प्लास्टिक की पाइपें थीं और न ही पानी का इतना दबाव देने वाली मोटरें। उस समय पूरी प्रक्रिया हाथों से की जाती थी। लकड़ी का उपयोग किया जाता था। स्थानीय रूप से तैयार की जाने वाली मजबूत “कोई” रस्सी से लकड़ी और पत्थरों को बाँधकर धीरे-धीरे धरती के भीतर मार्ग बनाया जाता था। वह कार्य अत्यंत कठिन और समय लेने वाला होता था, लेकिन उस समय के कारीगरों के धैर्य और अनुभव ने कभी उन्हें निराश नहीं होने दिया। आज तकनीक बदल गई है, साधन बदल गए हैं, लेकिन बेरी बनाने का मूल ज्ञान आज भी वही है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
जमालदीन ख़ान जी की बातें सुनकर मुझे बार-बार यही अनुभव हुआ कि आडानाळियाकेवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि धरती के भीतर छिपी जलधाराओं को समझने की एक अद्भुत लोककला है। यह ऐसी कला है जिसे केवल देखकर नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए वर्षों तक अनुभवी कारीगरों के साथ काम करना पड़ता है। शायद यही कारण है कि आज भी इस कार्य को करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है।
निष्कर्ष
बेरी का निर्माण केवल ईंट, सीमेंट और पत्थरों का काम नहीं है। यह धरती को पढ़ने की कला है। एक ऐसा ज्ञान, जो किसी पुस्तक से नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव से प्राप्त होता है। इसके लिए केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि धैर्य, साहस, अनुभव और प्रकृति की गहरी समझ की आवश्यकता होती है।
जमालदीन ख़ान जी ने बताया कि जब वे इस कार्य में सक्रिय थे, तब वर्ष भर अलग-अलग गाँवों से लोग उन्हें बुलाने आते थे। किसी गाँव में नई बेरी बनानी होती, तो कहीं पुरानी बेरी की मरम्मत करनी होती। कई बार ऐसा भी होता था कि खुदाई के दौरान पानी की परत बदल जाती और लोग घबरा जाते। ऐसे समय में अनुभवी कारीगर ही निर्णय लेते थे कि खुदाई कहाँ तक करनी है, कहाँ रोकनी है और अड़ानळिया किस दिशा में निकालनी है। यही अनुभव वर्षों के अभ्यास से विकसित होता है।

आज परिस्थितियाँ पहले जैसी नहीं रहीं। आधुनिक जलापूर्ति योजनाएँ, बोरवेल और अन्य तकनीकों के कारण बेरी बनाने वाले कारीगरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। जमालदीन ख़ान जी स्वयं अब नियमित रूप से यह कार्य नहीं करते। बढ़ती उम्र के कारण उन्होंने बेरी निर्माण का काम लगभग छोड़ दिया है। फिर भी वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार आज भी सहायता करने पहुँच जाते हैं। उनके लिए यह केवल रोज़गार नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों से मिली एक विरासत है।
फील्डवर्क के दौरान मुझे सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात यह लगी कि बेरी का निर्माण प्रकृति के विरुद्ध नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर किया जाता है। कारीगर धरती को काटने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसकी परतों को समझते हुए धीरे-धीरे उसके भीतर उतरता है। वह पानी को जबरदस्ती बाहर नहीं निकालता, बल्कि उसके स्वाभाविक मार्ग को पहचानकर उसे बेरी तक पहुँचाने का रास्ता बनाता है। यही कारण है कि अड़ानळिया जैसी तकनीक आज भी पारंपरिक जल-प्रबंधन का एक अद्भुत उदाहरण मानी जा सकती है।
जब मैं वहाँ से लौट रही थी, तब मेरे सामने केवल एक पक्की गोलाकार जल संरचना नहीं थी। मुझे ऐसा लग रहा था मानो उस बेरी की प्रत्येक कुंडी, प्रत्येक फ़ारमा और प्रत्येक आडानाळिया अपने भीतर अनेक पीढ़ियों का अनुभव संजोए हुए है। उस पानी में केवल वर्षा का जल नहीं था, बल्कि उन अनगिनत कारीगरों का श्रम, धैर्य और लोकज्ञान भी समाया हुआ था, जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के लिए पानी का मार्ग खोज लिया।
एक ईकोलिंग्विस्टिक शोधार्थी के रूप में यह अध्ययन मेरे लिए केवल एक जल संरचना का दस्तावेज़ीकरण नहीं रहा। इसने यह समझने का अवसर दिया कि स्थानीय भाषा और स्थानीय तकनीक एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। फ़रमा, कुंडी, कोठी, धोरा, तालर, आडानाळिया जैसे शब्द केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि मरुस्थल के लोगों की पर्यावरणीय समझ, उनकी जीवन शैली और उनके पारंपरिक ज्ञान के जीवंत प्रतीक हैं। यदि ये शब्द और इनके साथ जुड़ी तकनीकें लुप्त हो जाएँगी, तो केवल एक जल संरचना नहीं, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक विरासत भी हमारे बीच से धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
इसलिए आवश्यक है कि ऐसे लोक कारीगरों के अनुभवों को केवल सुनकर भूल न जाएँ, बल्कि उन्हें लिखित रूप में सुरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि आधुनिक तकनीक के अभाव में भी थार के लोगों ने अपनी बुद्धिमत्ता, सामूहिक श्रम और प्रकृति की गहरी समझ के आधार पर जल संरक्षण की ऐसी प्रणालियाँ विकसित की थीं, जो आज भी उतनी ही उपयोगी और प्रेरणादायक हैं।
यह लेख टीना ने समभाव के साथ 2026 में इंटर्नशिप के दौरान लिखा।
