पृष्ठभूमि
यह बाड़मेर का वर्षा ऋतु का गीत है। संग्रह के बाकी गीतों से यह इस बात में अलग है कि इसमें वर्षा के लिए प्रार्थना नहीं है — इसमें वर्षा को आते हुए देखा गया है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन — चार महीनों में प्रकृति में जो बदलता है, वह इस गीत में क्रम से दर्ज है। मेंढकों का टर्राना, मोरों की पुकार, बादलों की गर्जना, उत्तर दिशा में बिजली का चमकना, पपीहे और कोयल का बोलना, तालाबों का भरना — मरुभूमि के लोगों ने पीढ़ियों के अनुभव से वर्षा के इन संकेतों को पहचाना और गीत में बाँधकर सुरक्षित रखा। इसे वर्षा ऋतु में महिलाएँ और गाँव के लोग सामूहिक रूप से गाते हैं। हर अंतरे के बाद टेक लौटती है — गरजते बादल, बोलते मोर, और पशुओं के साथ निकलते ग्वाल।
गीत:
अरे चंद्रमा, सूरज एक रे, रास आषाढ़ ऊबो चाले रे
डरू डरू डेडर बोल मेघ बरसण आया रे
अरे गाजे घोरियल गहरी घोर बोले वन रा मोरा रे
मगरे मगरे ग्वाल मेघ बरसण आया रे
एड़ो हेताळू बीरा खेत रे सावण सरवर भरिया
अररर अम्बर वाली धार मेघ बरसण आया
अरे गाजे घोरियल गहरी रे घोर बोले वन रा मोरा रे
मगरे मगरे ग्वाल मेघ बरसण आया रे
उत्तर खण्डा में एक बिजळी चमके
मधुरी भादरवे री घोर मेघ बरसण आया रे
अरे गाजे घोरियल गहरी रे घोर बोले वन रा मोरा रे
मगरे मगरे ग्वाल मेघ बरसण आया रे
पीहू पीहू पपैया रे बोल कोयल किलोळे रे
अरे आशू महीने नोख्या जा जा डोर मेघ बरसण आया रे
अरे गाजे घोरियल गहरी रे घोर बोले वन रा मोरा रे
मगरे मगरे ग्वाल मेघ बरसण आया रे
बोल्या बारहठ माराज ईसर हरी रा दासा
समरु सायब जी रो नाम एक रजि तिल मासा
अरे गाजे घोरियल गहरी रे घोर बोले वन रा मोरा रे
मगरे मगरे ग्वाल मेघ बरसण आया रे
सरल अर्थ:
आषाढ़ मास आते ही चंद्रमा और सूर्य के विशेष संयोग के साथ आकाश में वर्षा वाले बादल दिखने लगते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में “ऊबो” कहते हैं। मेंढक टर्र-टर्र बोलने लगते हैं, मानो वर्षा के आने की सूचना दे रहे हों। घने बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है, वन में मोर आनंद से पुकारते हैं, और पशुपालक अपने पशुओं को चराने निकल पड़ते हैं।
श्रावण मास में अच्छी वर्षा से खेत, नाड़ियाँ, तालाब और सरोवर जल से भर जाते हैं। आकाश से निरंतर जलधाराएँ बरसती हैं और चरागाह हरे-भरे हो जाते हैं।
भाद्रपद मास में उत्तर दिशा में बिजली चमकती है। स्थानीय मान्यता में उत्तर दिशा की बिजली अच्छी वर्षा का संकेत मानी जाती है। इस महीने बादलों की गर्जना और वर्षा और भी गहरी होती है।
आश्विन मास में पपीहा “पीहू-पीहू” पुकारता है और कोयल मधुर स्वर में गाती है। वर्षा इतनी होती है कि हर धोरे और खेत पर पानी दिखाई देने लगता है।
अंत में कवि ईसर बारहठ महाराज स्वयं को श्रीहरि का सेवक बताते हुए प्रभु का स्मरण करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि ऐसी भरपूर वर्षा हो जिससे सब जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और मनुष्यों को पर्याप्त जल और अन्न मिले।
यह गीत बाड़मेर, राजस्थान में दर्ज किया गया।
दस्तावेज़ीकरण और अनुवाद: टीना गौड़।
